पुलिस ने पूर्व विधायक रणजीत यादव को पाया निर्दोष न्यायालय ने भी लगा दी मुहर
गया लाइव डेस्क। करीब 13 वर्ष पुराने चर्चित जदयू नेता सुमीरक यादव हत्याकांड में अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में राजद के पूर्व विधायक रणजीत यादव, विवेक यादव और देवी यादव को बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। फैसले में गवाहों के विरोधाभासी बयान, चिकित्सकीय साक्ष्यों की कमी और पुलिस अनुसंधान की महत्वपूर्ण बातों को आधार बनाया गया।
घटना के बाद की मेडिकल प्रक्रिया पर उठे सवाल
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि घटना के बाद घायल सुमीरक यादव को पहले थाना लाया गया, जहां से उन्हें चिकित्सकीय जांच के लिए अस्पताल भेजा गया। लेकिन प्रारंभिक चिकित्सा प्रतिवेदन (जख्म प्रतिवेदन) में सिर पर किसी चोट का उल्लेख नहीं किया गया। बाद में सिर में चोट की बात सामने आने से अभियोजन के दावे और चिकित्सकीय अभिलेखों के बीच विरोधाभास उत्पन्न हो गया, जिसका लाभ आरोपियों को मिला।
कोई भी गवाह पूरी तरह नहीं कर सका घटना की पुष्टि
सुनवाई के दौरान पेश किए गए गवाहों की गवाही का अदालत ने विस्तृत परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि कोई भी गवाह घटना के संबंध में स्पष्ट और एकरूप बयान नहीं दे सका। कई गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे, जबकि कुछ बयान अन्य साक्ष्यों से भी पुष्ट नहीं हो सके। ऐसे में अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर माना गया।
घटना के समय मुंबई के अस्पताल में थे रणजीत यादव
फैसले का सबसे अहम आधार पूर्व विधायक रणजीत यादव की मौजूदगी से जुड़ा रहा। अदालत के समक्ष पुलिस अनुसंधान में यह तथ्य सामने आया कि घटना के समय रणजीत यादव मुंबई के एक अस्पताल में इलाजरत थे। अनुसंधान के दौरान पुलिस ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया था।
पुलिस ने नहीं दाखिल किया था आरोप पत्र
जांच के दौरान पुलिस ने रणजीत यादव के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किया था। अनुसंधान रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि घटना के समय उनकी घटनास्थल पर मौजूदगी के साक्ष्य नहीं मिले। अदालत में भी पुलिस की ओर से यही प्रतिवेदन दिया गया कि रणजीत यादव घटना के समय वहां मौजूद नहीं थे। इसी आधार पर न्यायालय ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को टिकाऊ नहीं माना।
अभियोजन आरोप साबित करने में रहा विफल
अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस, विश्वसनीय और संदेह से परे साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इस मामले में चिकित्सकीय रिपोर्ट, गवाहों के बयान और अनुसंधान के निष्कर्ष एक-दूसरे की पुष्टि नहीं कर सके। इसलिए अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा और तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
13 साल बाद मिला न्यायिक निष्कर्ष
26 फरवरी 2013 को हुई इस हत्या ने उस समय जिले की राजनीति और कानून-व्यवस्था को लेकर काफी सुर्खियां बटोरी थीं। करीब 13 वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और पुलिस अनुसंधान का परीक्षण करते हुए तीनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
