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गुरुआ थाना में पत्रकारों का अपमान! सत्ता के आगे “नतमस्तक” दिखी पुलिस?

गया लाइव डेस्क। गुरुआ थाना में सोमवार को जो तस्वीर सामने आई, उसने बिहार पुलिस की कार्यशैली और “पीपल फ्रेंडली पुलिसिंग” के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक पत्रकार के साथ कथित मारपीट, बंधक बनाकर घुमाने और धमकी देने जैसे गंभीर मामले में न्याय की मांग लेकर पहुंचे पत्रकार प्रतिनिधिमंडल को थाना में जिस तरह अपमानित होना पड़ा, उसने पूरे पत्रकार जगत में आक्रोश पैदा कर दिया है।
हैरानी की बात यह रही कि भाजपा नेता पर गंभीर आरोपों की शिकायत लेकर पहुंचे पत्रकारों को थाना परिसर में बैठने तक के लिए कुर्सी नहीं दी गई। प्रतिनिधिमंडल खड़ा रहा और थाना प्रभारी पूरे घटनाक्रम को देखते रहे।
पत्रकारों को “खड़ा” रखकर क्या संदेश देना चाहती है पुलिस?
बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के टिकारी अनुमंडल अध्यक्ष दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में पत्रकारों का शिष्टमंडल गुरुआ थाना पहुंचा था। उद्देश्य था— एक पत्रकार के साथ हुई कथित गुंडागर्दी के मामले में पुलिस कार्रवाई की जानकारी लेना।
लेकिन थाना में जो व्यवहार हुआ, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अब पत्रकारों की कोई हैसियत नहीं बची?
क्या पुलिस यह संदेश देना चाहती है कि सत्ता से जुड़े लोगों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सम्मान नहीं मिलेगा?
“दो कुर्सियां थीं” — या जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
जब पत्रकारों ने सवाल उठाया तो गुरुआ थानाध्यक्ष ने सफाई दी कि उनके चेंबर में केवल दो कुर्सियां थीं।
लेकिन यह सफाई अब लोगों के गले नहीं उतर रही। सवाल उठ रहा है कि क्या एक थाना प्रभारी इतने भी सक्षम नहीं कि पांच मिनट में अतिरिक्त कुर्सियों की व्यवस्था करा सकें?
सच्चाई यह है कि अगर इच्छा होती तो व्यवस्था भी हो जाती। लेकिन यहां संवेदनशीलता नहीं, बल्कि उपेक्षा साफ दिखाई दी।
सत्ता का डर या पुलिस की चुप्पी?
पूरा मामला एक भाजपा नेता पर लगे गंभीर आरोपों से जुड़ा है। ऐसे में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं पुलिस राजनीतिक दबाव में तो काम नहीं कर रही?
एक ओर पत्रकार आरोप लगा रहा है कि उसे दुकान से उठाकर बंधक बनाया गया, पीटा गया और धमकाया गया। दूसरी ओर पुलिस का रवैया पूरे मामले में बेहद ठंडा नजर आ रहा है।
अब सवाल उठ रहा है—
क्या गुरुआ थाना सत्ता के प्रभाव में काम कर रहा है?
क्या इसी कारण पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया?
“पीपल फ्रेंडली पुलिसिंग” सिर्फ पोस्टर तक सीमित?
मुख्यमंत्री से लेकर डीजीपी तक लगातार जनता के प्रति संवेदनशील पुलिसिंग की बात करते हैं। लेकिन गुरुआ थाना में दिखी तस्वीर इन दावों को पूरी तरह खोखला साबित करती नजर आई।
जिस थाने में न्याय मांगने पहुंचे पत्रकारों को बैठने तक का सम्मान नहीं मिला, वहां आम आदमी की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
पत्रकार संगठनों में उबाल
घटना के बाद पत्रकार संगठनों में भारी नाराजगी है। कई पत्रकारों ने इसे सिर्फ बदइंतजामी नहीं, बल्कि मीडिया को दबाने और अपमानित करने की मानसिकता बताया है।
पत्रकारों ने चेतावनी दी है कि यदि मामले में निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई और पुलिस का रवैया नहीं बदला, तो सड़क से लेकर बड़े स्तर तक आंदोलन किया जाएगा।

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