केवल ग्रंथ नहीं, भगवान का साक्षात् शब्द-विग्रह है श्रीमद्भागवत: डॉ. संजय कृष्ण सलिल
गया लाइव डेस्क। शहर के धर्मसभा भवन में भागवत ममज्ञ आचार्य डॉ. संजय कृष्ण सलिल जी महाराज ने श्रद्धालुओं को द्वितीय दिवस की श्रीमदभागवत कथा का श्रवण कराया। उन्होंने बताया कि संसार में अनेक मूर्तिकार कागज़, लकड़ी या धातु से विभिन्न मूर्तियां बनाते हैं, परंतु वेदव्यास जी ने अद्वितीय कार्य करते हुए भगवान के शब्दों की मूर्ति का निर्माण किया, जो श्रीमद्भागवत के रूप में आज भी भक्तों के जीवन को प्रकाशमान करती है। महाराज जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान का साक्षात् शब्द-विग्रह है, जिसका श्रवण मन, बुद्धि और जीवन को पवित्र कर देता है। महाराज जी ने भागवत महात्म्य में नारद, व्यास, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के प्रसंगों के माध्यम से समझाया कि जैसे सूर्य अंधकार दूर करता है, उसी प्रकार श्रीमद्भागवत अज्ञान का नाश करती है। जिस घर, नगर या हृदय में भागवत बसती है, वहां भगवान की कृपा और शांति स्थायी रूप से निवास करती है। इसलिए भागवत श्रवण को कलियुग का सर्वोत्तम यज्ञ कहा गया है।
सच्चे भक्त की स्वयं भगवान करते हैं रक्षा
महाराज जी ने श्रद्धालुओं को जयमल प्रसंग सुनाया। राजा जयमल मीरा बाई के चचेरे भाई थे और वे भी भगवान के परम भक्त थे। महाराज जी ने श्रद्धालुओं को समझाया कि राजा जयमल ने अपने जीवन में भक्ति को सर्वोपरि रखा। कठिन परिस्थितियों में भी उनका ध्यान भगवान से नहीं हटा। जब राज्य पर शत्रु ने आक्रमण किया, तब भी उन्होंने अपनी भक्ति और ईश्वर पर विश्वास को कमज़ोर नहीं होने दिया। उनका अटूट समर्पण ही था कि स्वयं भगवान ने उनके राज्य की रक्षा की और शत्रु सेना को परास्त किया। इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि जब मनुष्य पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और विश्वास के साथ भगवान को समर्पित हो जाता है, तो ईश्वर स्वयं उसके रक्षक बन जाते हैं। कहा कि भक्ति की सच्चाई और मन की पवित्रता ईश्वर को प्रकट होने के लिए विवश कर देती है।
आओ-आओ हरि आओ मेरे अंगना…
कथा के दौरान भक्ति और भावनाओं का वातावरण इतना मधुर हो गया कि जब ना ही बनेगी गिरधारी हमारी जोड़ी… और मैंने बांध लिया प्रेम वाला कंगना, आओ-आओ हरि आओ मेरे अंगना…भजन की प्रस्तुति हुई तो श्रद्धालु भक्तिरस से सराबोर हो उठे। भजन-कीर्तन के सुरों ने श्रद्धालुओं को आनंद और भाव-विभोरता के अद्भुत संगम में डुबो दिया। कभी श्रद्धालु हाथ उठा कर झूमने लगे, तो कभी भक्ति की लहर में खोकर उनकी आंखें नम हो गईं। इसके बाद महाराज जी ने सूतजी-नारदजी, दुर्याेधन-अश्वस्थामा आदि प्रेरक प्रसंगों का श्रवण कराया।
