सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों की करें सहायता, अहंकार रहित दान ही श्रेष्ठ : डॉ. संजय कृष्ण सलिल
गया लाइव डेस्क। शहर के धर्मसभा भवन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर वृंदावन धाम से पधारे आचार्य डॉ. संजय सलिल जी महाराज ने मंगलवार को अपने अमृतमयी प्रवचन में दान की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान सदैव वहीं करना चाहिए, जहां उसकी वास्तविक आवश्यकता हो। दान करते समय किसी प्रकार का अहंकार या प्रदर्शन नहीं होना चाहिए, क्योंकि सच्चा दान वही है जो निःस्वार्थ भाव से किया जाए और जिसके बाद दाता उसे भूल जाए। आचार्य जी ने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि दान मनुष्य के जीवन को पवित्र बनाता है और समाज में समरसता स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत में दान को धर्म के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माना गया है, इसलिए हर व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करनी चाहिए। इस दौरान महाराज जी ने भीष्म पितामह के वाण-शय्या पर पड़े रहने वाला प्रसंग सुनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि भीष्म का उपदेश धर्म और कर्तव्य की उच्चतम सीख देता है। कथा के दौरान वातावरण भक्तिरस से सराबोर रहा।
माता-पिता की सेवा है महान धर्म
सलिल जी महाराज ने कहा कि माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा कर्म और महान धर्म है, क्योंकि उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना मनुष्य जीवन का मूल कर्तव्य है। लेकिन कलयुगी बेटा अंतिम समय में अपने मां-बाप को अकेला छोड़ देता है। इसपर उन्होंने कई उदाहरण प्रस्तुत किए। इस दौरान आचार्य डॉ. संजय सलिल जी महाराज ने राजा परीक्षित और कलयुग का प्रेरक प्रसंग श्रद्धालुओं को सुनाया। एक दिन जब राजा परीक्षित अपने राज्य का भ्रमण कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक काला-कलुटा व्यक्ति गाय और बैल को अत्याचारपूर्वक पीड़ा पहुंचा रहा था। महाराज जी ने श्रद्धालुओं को समझाया कि वह व्यक्ति कलयुग का प्रतीक था, जो धर्म के चारों स्तंभोंसत्य, दया, तप और पवित्रता को कमजोर करने का प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि कलयुग को मारने के लिए राजा ने धनुष-वाण निकाले तो कलयुग उनके पैरों पर गिरकर आश्रय मांगने लगा। इसपर राजा ने कहा कि जहां जुआ, मदिरालय, वैश्यालय व गौ हत्या होती है, तुम वहां रहो। कलयुग ने कहा कि महाराज ये चारों स्थान आपके राज्य में नहीं है। फिर उसने स्वर्ण में आश्रय लेने की अनुमति मांग ली। फिर उन्होंने परीक्षित को श्राप वाला प्रसंग कहा।
ओ मोहन आ ..भजन पर भाव विभोर हो गए श्रद्धालु
कथा के दौरान महाराज जी ने श्रद्धालुओं को तेरे संग रहेंगे ओ मोहन आ…., तुम चंदन बनो मैं पानी…आे मोहन आ..भजन सुनाया, जिसपर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। उन्होंने श्रद्धालुओं को संत की महिमा बताते हुए कहा कि सच्चे संत जहां पहुंच जाते हैं, वह स्थान स्वतः ही तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है, क्योंकि संतों का जीवन लोककल्याण और सद्भाव का मार्ग प्रशस्त करता है। महाराज जी ने कहा कि संत समाज में ज्ञान, करुणा और धर्म का प्रकाश फैलाते हैं और उनके सान्निध्य में मनुष्य का जीवन सकारात्मक दिशा पाता है।
